Friday, February 17, 2023

तुम्हारा चेहरा बता रहा है

 

छिपा हुआ था जो भी अंदर 
अक्षर अक्षर सुना चुके हो
तुम्हारा चेहरा बता रहा है 
इश्क़-दरिया नहा चुके हो 

अगर ख़ुशी का चेहरा होता 
हू-ब-हू वो तुम्हारे होता 
झलक रहा है निगाहों से 
अनमोल कुछ पा चुके हो 

आब ओ हवा बदल चुकी है
मन में खुशबू बिखर रही है 
तुम्हारा चलना बता रहा है 
अपना इरादा जता चुके हो 

छिपाओ इत्र छिपता कहाँ है 
हाल तेरा मुकम्मल बयां है 
कौन है वो जिसकी हाँ में
अपनी हाँ तुम मिला चुके हो 

~राहुल 

मुक्तक

 

बेबजह तेरे ऐब को बेनकाब करता रहा 
हाय! घाटे का हिसाब बेहिसाब करता रहा 
तेरा मिलना ही खुदा की इनायत थी 
बेसबब ही काफिराना जज्बात करता रहा!

~राहुल 

Friday, December 23, 2022

राम

दीवार पर  लिखा 'राम'
राम नहीं है
वह है सिर्फ कुछ  स्याही
और शब्द विज्ञान से जन्मी छाप!

आदमी शब्द को पहचानता है
पहले आकार से, फिर नाम से 
तब जन्मता है शब्द जिब्हा से

शब्द की आत्मा उच्चारण है
और आत्म की खोज राम!

'गुलाब' को गुलाब पढ़ना, शब्द विज्ञान है 
किन्तु मन में सुगंध का भर जाना,  राम है |

~Rahul

Sunday, September 4, 2022

जूते के काटने पर

 

जब मनुष्य ने उसे खोजा
वह वरदान साबित हुआ
उसने मनुष्य की यात्रा को
बहुत आसान बना दिया
तेरे और मेरे जैसे अनेकों को
वो नित पंहुचा रहा है
अपनी अपनी मंज़िल।

लेकिन उसे कभी वो सम्मान नही मिला
जो उसे मिलना चाहिए
उसे सिर्फ नीचा रखा गया
बाहर सीढ़ियों पर,
बाकी भिखारियों की तरह...
उसे मंदिर में जाने की अनुमति नही।

जब दाबतों में लोग पंक्तिबद्ध बैठे होते हैं
वो शामियाने के बाहर पड़ा रहता है
आंखे गड़ाये आसमान की तरफ
भगवान शायद कभी उसके मन की भी सुने।

रात में जब मैं सोता हूँ
वो पूरी रात मानो करता है
मेरी चारपाई की
निःस्वार्थ चौकसी!

कभी कभी स्वार्थी मानुस ने
उसका स्वार्थमय उपयोग भी किया
भरी सभायों में उसे पहुँचा यागया है
मंचों पर....
कुर्सी पर बिठाने को नही
कुर्सी पर बैठे नेता के तमाचा धरने को
फिर नेपथ्य में खो जाने को।

सरकारी दस्ताबेज आपको नही बताएंगे
लेकिन भगदड़ों में सबसे ज्यादा मौतें
उसी ने सही हैं।

मुझे बुरा नही लगा
आज जब मेरे पैर में
जूते ने काटा...
इसमे जूते की क्या गलती, गलती मेरी है
जूते के हिसाब से जो होनी थी, क्या मेरी तैयारी है?

उसके अहसानों के तले
मेरे पुरखे और उनके पुरखे तक
नख शिख तक दबे हुए हैं, मानो तो...
वरना दो कौड़ी के जूते तेरी औकात ही क्या
जब तुझसे पहले ही कितने नर नारी
ऊँचो के नीचे धसे हुए हैं, मानो तो...
तू पैरों की जूती, तुझमे कोई बात ही क्या?

किसी राजा ने यदि कभी जूतों को सम्मान दिया
वो हैं भरत, पादुकाओं को जिसने अपने शीश लिया
राम पादुका से पहले, वो भी जूते हैं
सच कि राजा रंक सब उनको छूते हैं।

~राहुल

Saturday, July 30, 2022

प्रेम


नग्न देह और खाली पेट
प्रकृति के अ, आ हैं
क से कपड़ा, ख से खाना
र से रोटी, प से पाना
प्रकृति की शेष वर्णमाला।
इसके आगे जो भी है वो कृत्रिम है
लेकिन कृत्रिमता कभी परम नही
इसका उद्गम भी प्रकृति ही है
जैसे शब्दकोष और वर्णमाला।

कृत्रिमता जीवन को सुगम करती है
जैसे शब्दकोश से विचारों की अभिव्यक्ति...
और इससे आगे गीत, कहानी, कविता।

ईर्ष्या, द्वेष, कुंठा, निंदा
मानव मन के सबसे पहले अक्षर हैं
इनसे आगे न बढ़ पाना
खाली पेट और नग्न देह की
पहली सीढ़ी पर खड़े रह जाने जाने जैसा है
प से पहिया और र से राकेट बनाकर
चाँद पर पहुंचना निजी निर्णय।

कृत्रिमता अच्छी चीज है
जैसे प्रेम।

~राहुल

जिंदगी का फ़साना


जिंदगी का
ये ही फ़साना
कभी गिराना
कभी उठाना...
उठने की ही शर्त है गिरना
ठोकर ठोकर गति पकड़ना
जीवन उसका जीना मरना
सीखा जो बस संभल के चलना

काम एक से, नाम एक से
गांव, गली, समाज एक से
मंत्र एक से, ईष्ट एक से
हाथ पांव सब अंग एक से
दो फिर भी कभी नही एक से...
एक ने सब खोकर भी पाया
एक ने संचित सभी लुटाया

तमस एक से दिवस एक से
आंधी, वर्षण,  रुत एक से
मंजर एक से, रंग एक से
घड़ी के कांटे चलते एक से
पर वक़्त की चालें नही एक से..
जो मिला वो यूं ही मिला नही
जो गिरा नहीं, वो उठा नही।
~राहुल

Saturday, July 16, 2022

माँ...

 

आंच न आने देती
जब तब डांट भी देती
चाहती है वो दिलोजान से...
कम नही किसी वरदान से...

थाली में दाना देती
बच्चों के गाने गाती
सुस्ताती तब इतमिनान से...
चाहती है वो दिलोजान से....

भरी धूप में छांव भांति
कैसे कैसे न बहलाती!
लाती खिलौने वो दुकान से...
चाहती है वो दिलोजान से...

ना कोई बूंद या आंधी
मंजर में न कोई व्याध भी
आयी मुसीबत आसमान से...
छोटी गोरैया भिड़ गयी बाज से...

चित पट की जोड़ घटा
कौन लुटा किससे पिटा
देखें तमाशा सारे मकान से...
बच्चों की मैय्या लड़ी जी जान से...
चाहती है वो दिलोजान से...

~राहुल राजपूत

भाईचारा


मानो चासनी जीभ पर 

गुलाब हो कमीज पर

बातों में शहनाई है

"तू ही मेरा भाई है"

यूं बोल घुसना पेट मे

बिच्छू जैसे रेत में

जोड़ जमा की दुकानदारी

हिसाब लगाती दुनियादारी

कभी इकाई, कभी दहाई

भाईचारा, यही है भाई।


Hi, hello से बाहर आकर

जब भाईचारा बढ़ता जाए

तेरी मेरी बात छोड़कर

किसी "और" को वो लाये

एक कहानी बड़े हिसाब से

सोच समझ कर मुझे सुनाये

एक वक्त था कि "वो" भी 

उसका भाई हुआ करता था 

मुलाकात जब भी होती थी

तपाक से मिला करता था

'दूर रहना उससे भाई

बंदा 'वो' बेकार है भाई

कुत्ते भर औकात नही

मेरी लात भी उसने खायी'


फिर उसने बोला, कुछ अधिकार जमाते

अच्छा हो ये बात, 'उसको' न कभी पता चले

 जय, सलाम, भाईचारा अपना भी बना रहे

दुनिया का दस्तूर ही ऐसा

कहीं कुआ, कहीं खाई है

सच कहता हूँ भाई,

बस तू ही मेरा भाई है...


देखे कैसे कैसे मैंने

छोटे, आधे, ओने पौने, 

जीभ के चाटु, जीभ के पैने

ऊपर चौड़े, भीतर बौने...


बेकार स्वार्थी ढूँढते मतलब

तपाक से आ मिलतेअक्सर

मेरी तासीर अलग है भाई

इसे खाई समझ या गहराई

ये भाईचारा पास तू ही रख

मेरा मुझको मौन मुबारक!


~राहुल

ग़ज़ल

 बिन मांगे कैसी ये मुझे सौगात मिल गयी

तेरी दुआ से घर मे मेरे आग लग गयी


हुक्मरानों के नुमाइंदों! क्या खूब है लिखा

हाय! बिजली आसमाँ से सूखी गिर गयी


मुक़द्दर कम्बख़त! न उनकी नेमत मिली

वो आले खुशनसीबों के रोशन कर गयी


संवेदनाएं शाह की इश्तिहार भर गई

अश्क की सच्चाई पर स्याही में घुल गयी


मैंने पूछा, रूह उसकी मक्का या काशी?

उस रात बिरयानी में जो बकरी तल गयी


~राहुल राजपूत

Wednesday, January 26, 2022

मेरा स्वार्थ

 

मैं इतना स्वार्थी हूँ
की मेरी कपड़ो की प्राथमिकता
कच्छे, मोजे और रूमालों पर
रुक जाती है
ये ही मेरे अपने हैं
बाकी सब तो दूसरों के लिए
दिखाने के लिए
या औरों की नज़रों के लिए
सुंदरता की प्रस्तुति है
इस से मुझ क्या लेना
की दूसरों की आँखों में
में सजूं या चुभूं।
मुझे तो मेरे आनंद से मतलब
मुझे मेरे कच्छे, मोजे और रूमाल से मतलब!

~राहुल राजपूत

Sunday, January 23, 2022

ॐ नमः शिवाय

 

ऊपर शिव है
नीचे शिव है
तेरे मेरे भीतर शिव है
आदि शिव है
अंत भी शिव है
हर संगीत की झन झन शिव है

【ऊँ नम: शम्भवाय,  च शंकराय 
मयस्कराय च नम: शिवाय...
ॐ नमः शिवाय...
जयति शिव नाम
शिव ही जप नाम...
महापापहारं, महादेव देवं
शशांकधारम, वह्नि नयनं,
त्रिनेत्राय, त्रियंबकाये, नमो नमाये
ॐ नमः शिवाय... 】

अथक नाचता तांडव जिसका
इस जग का वो करता धर्ता
जन्म मरण की पाली चलती
उसके डमरू की डम डम पर...

निरत बह रही उसकी सत्ता
वो ही सबकी नियति लिखता
भूत भविष की डोली उठती
उसके चरणों की धम धम पर...

सौम्या शिव है
रौद्र भी शिव है
तेरा मेरा भाग्य शिव है
जीवन शिव है
मरण भी शिव है
सम्पनता की खन खन शिव है

【ऊँ नम: शम्भवाय,  च शंकराय 
मयस्कराय च नम: शिवाय...
ॐ नमः शिवाय...
जयति शिव नाम
शिव ही जप नाम...
महापापहारं, महादेव देवं
शशांकधारम, वह्नि नयनं,
त्रिनेत्राय, त्रियंबकाये, नमो नमाये
ॐ नमः शिवाय... 】

ध्यान में रत महाध्यानी ऐसा
रुके समय भी, मांगे भिक्षा
रंग ऋतुयों की बारी लगती
उसके हृदय की धक धक पर...

सतत बह रही उसकी कृपा
वो ही रस्ता शव से शिव का
करम की करनी सारी छपती
उसके भवूत की कण कण पर...

शांति शिव है
क्रांति शिव है
तेरी मेरी भक्ति शिव है
जागृति शिव है
निंद्रा शिव है
सन्नाटों की सन्न सन्न शिव है

अथक नाचता तांडव जिसका
इस जग का वो करता धर्ता
जन्म मरण की पाली चलती
उसके डमरू की डम डम पर...

संहार झूलता महादेव का
वो जब भी आँखें खोलता
अमर तत्व की लाली मिलती
बम बम भोले की बम बम पर..

【त्रिनेत्राय, त्रियंबकाये, नमो नमाये
ॐ नमः शिवाय... 】

~राहुल राजपूत ©
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LG Anthem

 Hi, I had written this LG anthem on 16 December on the eve of my office family day You can search video song of it on YouTube as well! LG A...