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Wednesday, November 26, 2014

उसकी खातिर न सही, पर मेरी खातिर

पता है
तुम्हारे और मेरे दरमियाँ बस इतना सा फासला है
कि जब भी रातो को मुझे तुमसे मिलने का मन करता है
तो धीरे से ये बात मैं चाँद के कानों में फूक देता हूँ
वो तनिक सा सिर घुमा के तुम्हारी खिड़की में झांकता है
और तुम्हारी मुस्कानों के सारे राज मुझे बता देता है

पता है
कल रात चाँद ने मुझसे तुम्हारी शिकायत की है 
कि तुमने किस बेरहमी से सर्दी का बहाना बना के खिड़की बंद कर ली
वो तुम्हारी खिड़की की ग्रिल पकड़ के खड़ा था, 
तुमने ध्यान नहीं दिया ?
आया था वो सूजी ऊँगली और गीली आँखें लेकर पास मेरे

पता है
वो नाराज है, पर मैंने उसे मना लिया दो चॉकलेट देकर
आएगा  आज भी वो तुम्हारी खिड़की पर मेरी खातिर
अगर हाथो में चोट की वजह से न दे पाये वो दस्तक 
तो तुम सुन लेना उसके दबे कदमो की आहट 
और खोल देना खिड़की
उसकी खातिर न सही, पर मेरी खातिर...

Monday, May 5, 2014

cheers!

एक सम्प्रदाय विशेष की सभा में
माननीय नेता बोले-
चलो फिर  से खून गर्माते हैं
चलो दिल को ठंडक पहुचाते हैं

तभी,
भरी सभा से एक motivated बेवड़ा उठा
पास वाले ठेके से chilled beer ले आया 
और चिल्लाया, चलो नेता जी-
 फिर से खून गर्माते हैं  दिल को ठंडक पहुचाते हैं !

Thursday, April 24, 2014

Social Equality

drawing room, bedroom, kitchen,
पूजा घर, bathroom, toilet
सबकी अपनी अपनी अहमियत होती है,
जरूरत होती है.
पर ये भी तो नाइंसाफी ही है कि,
drawing room के हिस्से sofa  आ जाये
और bedroom के हिस्से गद्देदार  bed
kichen चूल्हे की गर्मी में तपती रहे
और बेचारा पूजा घर,
जहाँ luxury के नाम पर बस एक mat पड़ा है
bathroom, toilet तो कुछ दलित जैसे हैं
जो भी हिस्से में आ जाये क़ाफी  है, luxury है
पर ये  सबउसके १०० गज के घर को टुकड़ो में बाँटते हैं
भेदभाव पैदा करते हैं, right to equality defy करते हैं
इसलिए उसने घर की सारी internal दीवारें निकलवा दी
अब सब कुछ खुला है, sofa, bed, mat सब सामान वही है
पर inequality नहीं है.
अब अपने बैडरूम के गद्देदार  bed से ही वो
पूजा की चौकी पर विराजमान ईश्वर के दर्शन कर लेता है
या पूजा की mat पर बैठे बैठे TV news, गानो का मजा ले लेता है
हाँ दिक्कत होती है जब किसी family member की नज़रे
उसकी नज़रों से भीड़ जाती है जब वो toilet पर बैठा होता  है 
अगरबत्ती आज भी सुबहः सुबहःरोज जलाता है
लेकिन भगवान के लिये नही, बल्कि उस दुर्गन्ध को मिटाने के लिये
जो आती है उसके अपने दलित से !
घर में आज equality कायम है पर सुकून लापता है !

Wednesday, April 16, 2014

उर्दू - क़ल्ब-ए-जुबाँ

सारा मुद्दा गर चन्दन, जनेऊ, कलावा, और रोली का होता
बता तू हि ग़ालिब, जुबाँ से तेरी इश्क़ मुझे फिर कैसे होता !

Tuesday, April 8, 2014

छद्म धर्म

(१)

मंदिरो, मस्जिदो, गुरुद्वारों
और भगवान के उन तमाम आलो में
जहाँ तू और मैं खुदा ढूंढ़ने जाते हैं
सच माने तो, वहाँ  बस ढोंग होता है

मेरे घर की ताखों में तो,
अचार के बोट, बाम की शीशी, मिट्टी के तेल की बोतल,
लाण्टेन, मोमबत्ती  और दियासलाई जैसी चीजे मिलती हैं
वो अलग बात है  मैं लाण्टेन को खुदा कह दू और तू मान जाये 
तब मैं धर्म बन जाऊ, लाण्टेन खुदा और तू कट्टर अनुयायी
 मेरा समझा देना और तेरा मान लेना, बस यही धर्म है!!!


 (२)

असली धर्म के दर्शन तो बस कभी कभी होते हैं
न तो ये  दीये कि रौशनी में नज़र आता है
और न ही अगरवत्ती कि टिम टिम में,
 इसके दर्शन के लिए तो किसी चिंगारी का भड़कना जरूरी है

इत्र और धूप की गंध में इसकी असली खुशबू
शायद कभी दिमाग तक चढ़  ही नहीं पाती ,
जब ये  सड़को पर उतरता है अपनी हवस को
तब पता चलता है कि इसकी गंध घिनौनी है

तू अपने मज़हब  की खातिर जान दे देता है
और मैं धर्म यज्ञ की खातिर जीवन आहुति
ये धर्म मज़हब ही तो है जो समय से पहले,
बड़ी बेहरहमी से इच्छा के विरुद्ध दे  देता है,
मोक्ष-  जीवन का शाश्वत लक्ष्य ………।   

~ RR

Monday, March 24, 2014

हर घर में जब आज विराजित लक्ष्मी दुर्गा है

पूजा की वेदी से आँगन में काश गया उतारा होता
मूरत में जिसको पूजा, सूरत में गर खोजा होता
माँ मेरी ही लक्ष्मी होती, और बहन उसकी पूँजी
मैं होता दुर्गा का भाई और तू भाई अंबे  का होता !
~RR

Saturday, February 15, 2014

Ghazal

वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है
माथे पे उसके चोट का गहरा निशान है

वे कर रहे हैं इश्क़ पे संजीदा गुफ़्तगू
मैं क्या बताऊँ मेरा कहीं और ध्यान है

सामान कुछ नहीं है फटेहाल है मगर
झोले में उसके पास कोई संविधान है

उस सिरफिरे को यों नहीं बहला सकेंगे आप
वो आदमी नया है मगर सावधान है

फिसले जो इस जगह तो लुढ़कते चले गए
हमको पता नहीं था कि इतना ढलान है

देखे हैं हमने दौर कई अब ख़बर नहीं
पैरों तले ज़मीन है या आसमान है

वो आदमी मिला था मुझे उसकी बात से
ऐसा लगा कि वो भी बहुत बेज़ुबान है

दुष्यंत कुमार

Monday, January 13, 2014

पतंगे

(1)
इठलाती सी लहराती सी
मद्दम मद्दम इतराती सी
उठती हैं रंगीन पतंगे,
नभ नें मिलने मधुमासी सी

(2)
मैं प्रीतम तुम मेरी प्रेयसी
फिर तेरी मेरी दूरी कैसी!
मिलने को आतुर पतंगे
नहीं जानती किस्मत कैसी?  

(3)
जहाँ होता है प्रभु का वास
कहो गगन अम्बर आकाश
लड़ती हैं सरल पतंगे, सब
इंसानी चालो का प्रयास !


Monday, January 6, 2014

मोक्ष

चर्चा होती है,
गलियों में, मोहल्लों में, चौराहो पर
खरे वादो की, सपनो की, सुनहरे कल की
और फिर,
उमड़ पड़ता है जन शैलाव
धधक उठता है इंकलाब !

फिर एक दिन,
प्राची से उगने वाला पुराना सूरज
नई रश्मियों को जन्म देता है
रात रानी- सुमन दिन भर चहकते हैं
आक के फूल भी गुलाब से महकते है
संवेदनाओ के लहू से सिंचित इंकलाब,
पहुँच जाता है सत्ता की कुर्सी पर !

परन्तु, सत्ता संवेदनाओ से नहीं चलती
वरन उसको जरुरत होती है विवेक की
बैठ जाता है कोई भारी भरकम बुद्धिजीवी,
फिर इंकलाब के ऊपर विवेकी बन  कर
इंकलाब दम तोड़ देता है
फिर से जन्म लेने को
फिर से मोक्ष पाने को !


Wednesday, December 11, 2013

आज का सपना

आज सुबह उठा तो, सबसे पहले मैंने लैपटॉप खोला औऱ लिखने बैठ गया. आज का सपना. शायद ऐसी कोई नींद नहीं जिसमे सपने न आये हो. पर आज का सपना थोडा अलग सा था कि मैंने इसे लिखना बेहतर समझा. 
मेरी बहन के कहने पर मैं उस अनजान शहर में आया था. उसको किसी धार्मिक rally में शामिल होना था. ये तो मुझे याद नहीं कि उस शहर तक हमे ट्रैन ने पहुचाया था या बस ने. हां, इतना जरुर याद है कि ट्रैन भी उस यात्रा का हिस्सा रही थी. कुछ सामन मैं ट्रैन में भूल गया था. जब तक मुझे याद आया, ट्रैन जा चुकी थी. औरे उसके बाद scene बदल जाता है. सपने होते ही ऐसे हैं. बिखरे हुए से, अधूरे से, ऐ वै कुछ भी, समझ से परे. और उस नए scene के साथ ही मैं अपनी अपनी बहन के साथ इस नए शहर की चौखट पर खड़ा था.  कीचड भरी सड़को ने मेरा स्वागत किया व समाज की जिम्मेदारी और सरकार की मक्कारी का नमूना बखूबी पेश किया. तभी मेरी बहन ने बैग से एक address निकाला और 'यहाँ जाना है' कहते हुए मेरे हाथ में थमा दिया.
थोड़ी देर में कीचड भरी सड़क को कूदते फांदते उस पते पर पहुच गए. एक औरत ने दरवाजा खोला. मैं तो नहीं जानता था पर मेरी बहन उन्हें जानती थी और पहली बार इल रही थी. कोई दूर की जान पहिचान थी.  मैं उसको वहाँ छोड़कर, नए शहर बदतर सड़को पे चलने लगा. Scene बदला. मुझे एक पुराना दोस्त मिला. वो भी उसी शहर में रहता था. मुझे नहीं पता था. वो मुझे अपने घर ले गया जहाँ पहले से ही और दोस्त लोग बैठे थे. आधा दर्जन से ऊपर. शायद सब मेरे इंतज़ार में. उन सब के चेहरे अभी भी याद हैं. उनकी बाते भी याद हैं. उठने के बाद भी दिल में एक ताज़ी ख़ुशी अभी भी बरकरार है. चाहे सपने में ही मिला, पर मिलकर अच्छा लगा था. feeling तो अभी भी ऐसी ही है जैसे वास्तव में उन सब को गले से कस के आ रहा हूँ. ऐसे अनुभव कभी कभी एहसास कराते हैं की ये जिंदगी भी कोई एक सपना मात्र तो नहीं. खैर ! Scene  फिर से बदला, दोस्तों को bye बोल चुका था. शाम का वक़्त होने को था और मैं फिर किसी अनजान बसती की अनजान गली में घूम रहा था. तभी अचानक एक शोर सुनाई दिया. लोगो के चीखने चिल्लाने की आवाज़. एक बड़ा झुण्ड बढ़ा चला आ रहा था गली की ओर, मेरी ओर. झुण्ड को देख ये समझने में कुछ देर न लगी की ये धार्मिक कसाइयों का समूह था. गली में खेलते बच्चो को अपनी ओर खीचा ओर पास वाले घर में घुस गया. भले ही झुण्ड का रंग मेरे मस्तिष्क से मेल खाता हो, पर मैंने धार्मिक कायर होना बेहतर समझा ओर अंदर से कुण्डी लगा ली. औऱ करता भी क्या?  आगे क्या हुआ मुझे याद नहीं. हाँ, बस मुझे मेरी बहन की चिंता थी क्योंकि उस वक़्त वो किसी rally में रही होगी. मैं उसकी सलामती के लिए बस भगवान् से दुआएं मांग सकता था. औऱ मुझे कुछ याद नहीं. न ही बेबस चीखें, न ही वो बर्बर दृश्य. शायद मेरे कान वो चीखे नहीं सुनना चाहते थे औऱ न ही आँखे उस नृशंश मंजर को बेबसी से निहारना जो धर्म के नाम पर जन्मा होगा. 
Scene फिर से बदल जाता है. मैं एक बड़ी सी बिल्डिंग के अंदर हूँ. शायद कोई सरकारी संसथान, कोई स्कूल या कुछ ऐसा ही. वो एक राहत शिविर था, बेबस भाग्यवानों के लिए. नए शहर ने जहाँ मुझे बेबस होने का एहसास कराया, तो दूसरी औऱ दंगो की बजह से मैं भाग्यवान महसूस कर रहा था. आखिरकार मैं जिन्दा था. मैं उसके बारे में सोच ही रहा था कि उस जमावड़े में मैंने अपनी बहन को पा लिया. ज़िंदा. सुरक्षित. मैं खुश था.  औऱ दूसरे पल ही एक औऱ चेहरा उन सब लोगो में नज़र आया. एक लड़की, जिसको मैं  कुछ साल पहले ही मिला था. ये वो ही लड़की थी जिसकी पहली झलक ने ही मुझे प्रेम नामक तरंग का ज्ञान कराया था. जिसको देखते ही दिल कि ख़ुशी मुस्कराते होंठो से खुद-व-खुद बयां हो जाती थी. सपने में भी तो कुछ कुछ हमारे दिनों जैसे ही होते हैं. औऱ सपने में भी मैं उस तरंग को अपने भीतर संचरित होने से इंकार नहीं कर पाया. मैं मुस्करा रहा था. उसने भी मुस्करा कर मेरी मुस्कान का जबाब दे दिया. हमेशा कि तरह, आज भी बस इतनी सी ही बात हुई हम दोनों में. यह जानते हुए भी कि she is not available, she already have a boyfriend, मैं यह सोचते हुए मुस्करा रहा था -"कि जो भी हुआ अच्छा हुआ."
औऱ फिर मोबाइल के अलार्म ने मुझे नींद से जगा दिया.
उठने के बाद भी सब कुछ दिमाग में चल रहा था. सबसे ज्यादा याद था तो उसकी मुस्कान औऱ मेरा casual way में कह देना कि जो भी हुआ अच्छा हुआ. भले ही यह एक सपना था, पर जो भी हुआ था अच्छा नहीं हुआ था. कितने बेक़सूर लोग मारे गए होंगे उस दंगे में.
आखिर मुझे मिला क्या कि मैंने जो भी हुआ अच्छा हुआ वाली धारणा को स्वीकार कर लिया? बस दिल को गुदगुदाने वाला एक एहसास! औऱ इस हल्के से अहसास के लिए, जिसे मैं समझता हूँ कि झूट अहसास या छलावा कहना उचित होगा, मैंने उस निंदनीय घटना को  सही ठहरा दिया.

तब मेरे अंदर अनेक विचार उमड़ने लगते हैं. क्या आज का धर्म भी एक अहसास मात्र तो नहीं? या धर्मं को हम दिल को गुदगुदाने को उपकरण समझ बैठे हैं? धर्म का असली रूप पहचानने कि जरूरत. धर्म एक छलावा मत बनने दो.

LG Anthem

 Hi, I had written this LG anthem on 16 December on the eve of my office family day You can search video song of it on YouTube as well! LG A...