Monday, April 26, 2021

वाह मेरे ओ मीडिया-कार!

 


एक था मरकज, एक था कुम्भ
एक निराधम, एक विशुद्ध।

एक आक्रांता, एक सनातन
एक जलालत, एक तथागत।

एक स्वार्थी, एक उदार
एक महामारी, एक उपचार।

वाह मेरे ओ मीडिया-कार!
Democracy के आधार।

Sunday, April 25, 2021

नैनन तेरे...

 नैनन तेरे

दो दिए जलते
रोम रोम हर
आंनद भरते
तेरा होना
सब पूजा-सा
तू ही कान्हा
न दूजा-सा।
फिर क्यों मैं थाल सजाऊँ
अगर कपूर से घर महकाऊं
शुभ लाभ तेरे
अधरों से झरते
नैनन तेरे
दो दिए जलते।

हाथों में तेरे
जादू टोना
छू ले, कर दे
मन को सोना
किस किस को क्या भोग लगाऊं
धनिक मैं ऐसा, क्या बतलाऊँ
मुस्कानों में
सब रस झरते
नैनन तेरे
दो दिए जलते।

~राहुल

Tuesday, March 23, 2021

ज जवान... भय भगवान...

 1.

पहले प्रकृति आयी, 
फिर इंसान आया
इंसान ने आपदा देखी
प्रकृति का प्रकोप देखा
उर का भय देखा
फिर भगवान देखा।

2.
भगवान ने भय मारा
इंसान का 'मैं' उभारा
फिर 'मैं' से ज्ञान जन्मा
इंसान को वर्गों में बांटा
कोई बना ईश प्यार
कोई रहा दुर्बल बेचारा

3.
उन्माद-सा जब चढ़ गया
तिलक टोपी-सा गड़ गया
प्रकृति का कोई भय नही
किन्तु, भय फैलाया स्वयं
भगवान के भक्तों ने ही
भगवान का ही भय दिखाकर।

4.
भय से जन्मे देवता को
भगवान कहना!
भय भागने को उसी की
शरण गहना!
पागलों का फिर और क्या कहना?

Saturday, March 20, 2021

तत्काल

वर्तमान का शैशव है तत्काल
जो तत्काल को जी सका
वो भाग्यशाली है।

मैं इस तत्काल का थोड़ा हिस्सा
तब जी पाता हूँ
जब नीर के साथ होता हूँ।
(नीर मेरा 2 साल का बेटा)
या, यूं कहूँ कि 
उसके तत्काल का 
मैं हिस्सा बन जाता हूँ।

उसे सिर्फ तत्काल का अहसास है
भूत और भविष्य तो केवल virtual reality.

Friday, March 19, 2021

Ripped जीन्स !

Sir अब CM बन गए हैं। मीटिंग बुलाई है, विकास कैसे करना है? लोगों तक कैसे पहुँचना है? Sir थोड़ी दुविधा में हैं। हाई कमान ने ऊंची कुर्सी पर तो बिठा दिया है, लेकिन सोच में हैं कि चहुदिश विकास कैसे करें। sir बहुत ही सज्जन व्यक्ति हैं। एक दम भोले के भक्त से, टीका तिलक वाले। state भी एक तल में नही है कि साहब यहां बैठे बैठे हम जैसों को लतियाये और विकास लुढकते लुढकते सुदूर कोने में बेरोजगार पड़े या गरीबी की लाइन में खड़े आखिरी पशु (पशु से यहां अर्थ गाय नही है) तक खुद ब खुद पहुँच जाए।

कुछ क्रांतिकारी विचार चाहिए। इसलिए मीटिंग बुलाई है। अब फ़ोन रखते हैं।
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ये छोटे साहब बड़े साहब के मुख्य सलाहकार हैं और हमारे मन के मित्र। 
******
🐧क्या मियां, तुमने तो बबाल idea दे दिया साहब को। आग लगा दी है । लेकिन ये अच्छी बात नही की तुम जैसे लोग भी नारी विरोधी हो जाओ, 2 कोड़ी की नौकरी के लिए।
🐦अरे हमने तो बस ये idea दिया था कि sir, ये दुनिया बड़ी ही जालिम है। नाजायज विकास को कोई अपनी चौखट पर फटकने भी न देगा। कोई ऐसा अपशगुन क्यों ले। नाजायज तो दलित से भी नीच होता है। बिन बाप का विकास कुछ ऐसा ही होगा, जैसे सड़क के आवारा कुत्ते। इसलिए, पहले विकास नियोजन करिये। कुछ ऐसा करिये की लोग आपको जाने। आपके वीर्य को पहचाने और जब लोगों को विश्वास हो जाये कि विकास आपके ही श्री मुख से होगा, तो करते रहना विकास। जीभ हिलाने का परिश्रम उच्च कोटि का पुरुषार्थ है। 
🐧वाह। क्या idea है।
🐦अरे, sir बहुत खुश हुए idea सुन के। उन्होंने कहा कि वह उच्च कोटि का पुरुषार्थ करने से पीछे बिल्कुल न हटेंगें। फिर उन्होंने कहा कि कुछ suggest करें। हमने कहा - sir, कुछ सनसनी statement दीजिये मीडिया में। तभी लोग आपको पहचानेंगे। वरना आप north east की तरह हो भी, नही भी वाली केटेगरी में रह जाओगे। और आपके पास तो समय भी कम है। कम समय में ज्यादा पुरुषार्थ करने के लिए, कुछ अतिक्रन्तिकारी तो करना होगा।
🐧तो आपने क्या क्रांतिकारी सुझाब दिया?
🐦हमने कहा, sir इस बार patriarchy को challenge कर दीजिये। जैसे कि मीडिया में आकर कहें कि parents को अपने लड़कों को संस्कार देना चाहिए। गाली गलोच न करें। धूम्रपान न करें। kichten में माता जी का हाथ बटाए। और बीच बीच में सभ्यता संस्कृति का तड़का मारते हुए, मर्यादा पुरूषोत्तम राम को पेश करें। उत्तर प्रदेश से पहले, उत्तराखंड में रामराज्य, gaurenteed!
और ....
इससे पहले की हम कुछ और बोल पाते, हमको दुत्कार दिया गया। अब तक प्रमोशन के लिए हमारी दावेदारी जितना प्रबल हमे feel हो रही थी, अगले ही क्षण हमने अपने आप को गरीबी की लाइन में खड़े आखिरी पशु के साथ पाया। इस बार यह पशु गाय ही थी। तब हमको समझ आया कि गाय और बैल एक समान है, जैसे कि विकास और प्रगति।
🐧😌 hnmmm
🐦और अब पुरुषार्थ आपके सामने है। साहब ने, विकास को काँधे पर बिठाकर प्रगति की jeans फाड़ दी।
~RR
Disclaimer: व्यंग्य की समझ वाले ही पढें।

Sunday, March 7, 2021

देसी प्यार!

 सूरज की किरणों सा हर रोज मिल

मिल कर मोहब्बत का लिबास सिल

फिर रंग घोलूँ
नजरों से तोलूँ
आहिस्ता आहिस्ता, 
आंखों से बोलूं
रंग देना तू फिर मुझे...
यार, रंगीन ऐसा कुछ प्यार कर
F.I.R.  सा सीधा इज़हार कर
सीटी बजाकर, कुछ पास आकर
बेखौफ, उम्दा सरल प्यार कर।

संतरे वाली टॉफी,
या बुढ़िया के बाल।
ठेले की टिक्की, या
सरोजिनी का माल।
जो ठीक समझे,
पेश जज्वात कर
हाँ, जैसे भी करना, बस यार कर
शुद्ध देसी सच्चा तू प्यार कर।

छुप छुप के मत तू हर रोज मिल
कभी घर भी आ, जैसे बिजली का बिल
मैं तुमको देखूँ
क्या क्या न सोचूं
आहिस्ता, आहिस्ता
आंखों से बोलूँ
रंग देना तू फिर मुझे...
यार, रंगीन ऐसा कुछ प्यार कर
F.I.R. सा सीधा इज़हार कर
सीटी बजाकर, कुछ पास आकर
बेखौफ, उम्दा सरल प्यार कर।
ऑटो से ले चल
या चल तू पैदल
बस करना तू मेरी
परवाह...
हाँ, हाँ जैसे भी करना, बस यार कर
शुद्ध देसी सच्चा तू प्यार कर।
               ---Rahul Rajput

Saturday, December 26, 2020

संस्कृति

 तुम बेफिजूल की बातें न करो

औरत हो, घर चलाओ।

हमारे परिधान हमारी संस्कृति हैं
ब्लाउज और साड़ी में जेबें नही होती।

उसने जबाब दिया - क्या दोगले इंसान हो
पैंट शर्ट तो जैसे सनातनी परिधान है।

अब उसके पास दो ही ऑप्शन हैं
या तो अपनी औरत को भी पैंट शर्ट दिला दे
या ब्लाउज में जेबें गढ़वा दे।

लेकिन उसकी औरत ने साफ कर दिया है-
हमारे परिधान हमारी संस्कृति हैं
ब्लाउज और साड़ी में जेबें नही होती।

जब से संस्कृति का ढोल बजना बंद है
जीवन दोनो का जैसे गीत, रुबाई छंद है।

~Rahul

Sunday, December 20, 2020

करमजली

 मत भूलो करमजली,

तुम एक factory हो

जिस से उत्पाद बनते हैं।

उत्पाद की गुडवत्ता ही 
factory की पहिचान है
सम्मान है, अभिमान है ।

दो बेटियों के बाद उसने
फिर से
एक और बेटी जन्मी।
उसकी सास खिन्न है-
आँखें बोलती हैं, करमजली।

एक नारी के लिए 
दूसरी नारी का सारा ममत्व व्यर्थ है।

Sunday, September 27, 2020

हम तुम

 दुनिया बहुत छोटी है। सब ऐसा कहते हैं लेकिन मुझे अभी अभी इस तथ्य का अनुभव हुआ जब मैंने अचानक अंकिता को पोपकोर्न काउंटर पर देखा। मैं भी बिल्कुल उसके पीछे खड़ा था। मुझे भी पोपकोर्न लेनी थी। हालांकि मुझे पोपकोर्न पसंद है लेकिन मल्टीप्लेक्स की पोपकोर्न के दाम जीभ के स्वाद को थोड़ा फीका कर देते हैं। खैर, इसको आप मेरी कंजूसी भी मान सकते हैं।

मैं शायद उसको बहुत गौर से देख रहा था। बिल्कुल वैसे ही जैसे मैं उसे देखता था एक मुस्कुराहट के साथ, मेरी शादी होने से काफी पहले तक। उसने भी पेमेंट किया, पॉपकॉर्न bucket लिया, मुड़ी और फिर एक सेकंड के लिए शायद मुझे देखा होगा, वैसे ही जैसे कोई भी देखता है एक अनजान भीड़ को। 
दूसरा तथ्य जो मुझे समझ आया कि दुनिया जितनी छोटी होती है, उसकी मेमोरी भी उतनी ही छोटी है। ये कोई चिंतन का समय नही था कि मैं ये सोचूँ कि उसने मुझे पहचाना तक नही? हालांकि, मेरे नजरिये से तो हमारे बीच गहरी दोस्ती रही थी। गहरी भी इतनी कि मैं तो यही मानता हूँ कि उसके बांए गाल पर जो तिल है उसका रंग थोड़ा धुंधला पड़ गया था मेरे कारण। मैंने उसे कितनी बार छुआ होगा मुझे भी याद नही, कभी हंसी मजाक में तो कभी प्यार में।
मैंने उसे यदि इतनी आसानी से पहचान लिया था तो इसमें भी कोई विशेष बात नहीं थी जिसका मैं क्रेडिट लूँ । और यदि उसने मुझे नही पहचाना तो इसमें भी कहीं मेरी ही खामी थी। मैं शायद एन्टीसोशल टाइप प्राणी हूँ और शायद नहीं भी। लेकिन एक बात तो पक्की है कि facebook और Instagram जैसे प्लेटफार्म पर तो मैं अपने को antisocial ही कहूंगा। मैंने पिछले ६ साल से कोई अपडेट नहीं किया था अपने फेसबुक पर जबकि फेसबुक पर उसके अपडेट धड़ल्ले से आते हैं. लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि मैं उसकी दुनिया की हलचल से अनजान था . दिन में 2-4 बार तो मैं भी देख लेता हूँ अपना फेसबुक खोलकर, और आज सुबह ही उसकी ताजी ताजी पोस्ट भी देखी थी। उसने अपना एक फ़ोटो अपलोड किया था। शायद recently नई कार ली है। white होंडा अमज़े के साथ बहुत खुश नज़र आ रही थी। लेकिन वो मुश्किल से ही कभी सिंगल फ़ोटो डालती है। लेकिन आज उसने एक्स्ट्रा फ़िल्टर लगे वो फ़ोटो नही डाले थे जिनमें में उसके बाएं गाल का तिल ढूंढने में, मैं हमेशा असफल रहा। 
मैं इतने में पॉपकॉर्न लेता और पेमेंट करता, वो थिएटर में जा चुकी होती। अभी मूवी बची थी। पिक्चर इनटरवल में हम दोनों बाहर आये थे। इसलिए, मैंने उसको आवाज दी - अंकिता।
उसने पलट कर काउंटर की तरफ देखा कि आवाज किसने दी। मैने हल्का सा अपना हाथ उठा कर wave किया। कुछ सेकंड के लिए उसने मुझे देखा फिर उसके चेहरे पर एक मुस्कुराहट खिल उठी।
वो मेरी तरफ आयी और मुझे hi बोला .
मैंने भी मुस्कराकर hi कहा.
"For a moment I could not recognise you. You have so much changed!" उसने कहा.
उसकी अचरज भरी आँखों में मैंने वो सब देखा जो मैंने facebook की दुनिया से छिपा रखा था . पिछले ६ सालों में मैं एक लड़के से अधेड़ उम्र का आदमी बन चुका था .
"but you have not Changed a bit. still looking same as we met last time." उसकी ही सिखाई जुबान में उसकी तारीफ करने से मैं अपने को न रोक पाया। इसको आप फ़्लर्ट भी कह सकते हैं।
एक गुलाबी सी मुस्कान उसके गालों पर पसर गयी बिल्कुल वैसे ही जैसे अंधेरी रातों में चौथाई चाँद दिखता है। blush से कहीं ज्यादा खूबसूरत।
"यहां कैसे?" मैंने उसकी आंखों में सीधे देखते हुए पुछा.
"मूवी देखने आयी हूँ"
"हाँ, हाँ that is obvious. I mean what are you doing in Ghaziabad?"
"I am working in sector 62."
इतने में काउंटर बॉय ने पॉपकॉर्न बकेट काउंटर पर रखकर बोला- sir your order is ready.
यूँ तो मैंने सिर्फ formality में पूछा था कि यहाँ कैसे, वैसे तो facebook ने मुझे सब बता रखा था।तभी एक नौजवान लड़का वाशरूम की तरफ से हमारी और आता दिखा।
तब उसने मुझे उस लड़के से मिलवाया। उसकी हालही में शादी हुई थी। ये भी ज़ुकरबर्ग भैया की मेहरबानी से हमे पहले से ही पता था। लेकिन मैं आपको बता दूं कि ये सब सुनने के बाद आपके मन में यदि मेरे लिए एक negative opinion बनती है जैसे कि stalker या creep टाइप, तो आपको इलाज की जरूरत है। खैर, वो नोएडा में किसी software कंपनी में जॉब करता है। शादी की बात पर मैंने 'यार बताया नही' एक्सप्रेशन देते हुए wow, ग्रेट जैसे शब्दों की गार्निशिंग के साथ many many congratulations कहा। और मुझे लगता है कि ये बताने की जरूरत नही है कि यह कहते हुए मेरी खुशी का तो कोई ठिकाना ही नही था। खुशी दिखाए बिना congratulation कहना तो मैं अपराध मानता हूं और कृपणता की पराकाष्ठा।
छोटे से वार्तालाप के बाद वो स्क्रीन 3 में चली गयी और मैं स्क्रीन 1 में। हमेशा की तरह आज भी हमारी choices अलग थी।
लेकिन आज मुझे एक बात का एहसास हुआ कि हम दोनों ही mature हो चुके थे। मैंने कभी सोचा भी नही था कि हम कभी जिंदगी में मिलेंगे और मिलेंगे भी तो ऐसी मुस्कान के poसाथ। क्या आप कभी मिले हैं अपने ex से इस खूबसूरती के साथ? जैसे कि दो मित्र मिलते हैं एक लंबे अरसे के बाद। शायद मेरी तरह उसने भी सब कुछ भुलाकर सिर्फ वो लम्हे याद रखे थे, जिनमे हम दोस्त थे, crush या lover नही। उस शाम, तकरीबन 6 साल बाद, मेरे फेसबुक पर उसका फिर से मैसेज आया जिसमे लिखा था, lets meet on some weekend.
मैंने अपने को शीशे में देखा और खुद से कहा - क्यों नही! चलो एक बार फिर से दोस्ती दोहराएं हम दोनों...
Disclaimer : उपरोक्त कहानी के सभी पात्र काल्पनिक हैं😁😊

~Rahul Rajput

Thursday, September 24, 2020

मैं किसान हूँ...

 सपनों की दूबे उगती हैं

मेरे भी अंतर मन में
करने को आबाद मेरे यथार्थ को!
या करने को बर्बाद मेरे यथार्थ को?
मैं किसान हूँ...

खेतों में उपजी गैर जरूरी
खरपतवारो की भाँति ही
उखाड़ फेंकता हूँ मैं उनको
उनके कच्चे शैशव में ही
और बचा पाता हूँ मेरे यथार्थ को!
मैं किसान हूँ...

मैं जर्रा जर्रा धुन लेता हूँ
अस्थि पंजर-से शरीर का
कि बन पाऊँ गंगाजल
अपने कुमलहाते परिवार का

हाय! श्रम-वारि से सिंचित 
क्यों अन्न सस्ता बिकता है
किसान हित में ऊपर वाला
क्यों फूटी किस्मत लिखता है?

मैं खुद को भी यदि गाड़ दूं
धान के पौधे जैसा खेत में
और फुट पड़े नन्ही कोपल
मेरे अंग अंग हर एक से
मेरी रूह से सिंचित फलों को
क्या बेच सकोगे बाजार में
तुम सोने-से भाव पर?
यूं रहमत कर पाओगे मेरे परिवार पर?

Tuesday, July 7, 2020

ओ जिंदगी!

करो खेल जितने करने हैं
कंटक जितने भी भरने हैं
कष्ट सखी तुम जितने देना
न राह सुगम फिर भी मांगूंगा
जिंदगी, तुम्हे सदा ही चाहूंगा।

जीवन की तपती राहों में
तुम ला चाहे अंगारे रखना
ब्यथा नयी नित मुझको देना
मैं गीत नया एक फिर गा दूंगा
ओ जिंदगी, यूं मन की कर लूंगा।

दुर्भागी-सा एहसास दिला
अठखेली तुम जितना भी करना
अवरोध जहाँभर पथ में रखना
फिर भी हस्तरेख में न खोजूँगा।
तुमसे अठखेली मैं भी खेलूंगा ।

LG Anthem

 Hi, I had written this LG anthem on 16 December on the eve of my office family day You can search video song of it on YouTube as well! LG A...