Friday, December 21, 2012

क्या वक़्त हमेशा ऐसा ही तमाशा दिखायेगा?

फिर संसद में चर्चा मुखर  होगी
हर जुवां पर बस एक खबर होगी
जब तक रुधिर में तेरे तपन होगी
बस तब तक ही  यहाँ समर होगी

फूलों के गुलदस्ते भी भेजे जायेंगे
संवेदनाओं वाले ख़त-चिट्ठे भी आयेंगे
कुछ जुलुस भी निकलेंगे विरोध में
और चौराहों पर दिए भी जल जायेंगे

तपिश सुन्न,याददाश्त धुंधली होगी
वक़्त फिर से कोई नया राग छेड़ेगा
फिर से उमड़ेंगे गगन में बादल घने
और संवेदनाओं के सारे आंसू धोदेगा
कमबख्त वक़्त बरसेगा हर जगह,
पर न अपनी शरारती आदत छोड़ेगा
सख्त जिसको है जरुरत शीत की, बस
छोड़ उसको सारी दुनिया भिगो देगा

चंद जिगर रह जायेंगे सदा शोलो से फफकते हुए
बाकी आग ठंडी होगी, रह जायेंगे राख के सिलसिले

फिर से जिंदगी एक हसीं सफ़र होगी
सड़कों पर फिर वही वेहशी नज़र होगी
सलामत रह गए तो उसकी रहबर होगी
वरना अख़बारों में फिर तेरी खबर होगी

क्या वक़्त हमेशा ऐसा ही तमाशा दिखायेगा?

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